Friday, November 23, 2018

बीमार बेटी की देखभाल करना चाहती हैं मौसमी चटर्जी, बॉम्बे HC से मांगी इजाजत?

बॉलीवुड एक्ट्रेस मौसमी चटर्जी और उनके पति जयंत मुखर्जी की बेटी पायल लंबे समय से बीमार हैं. कपल ने दामाद पर बेटी की सही से देखभाल ना करने का आरोप लगाया है. मौसमी-जयंत ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया है. वे चाहते हैं उन्हें बेटी की देखभाल करने की इजाजत दी जाए.

मौसमी की बेटी पायल जुवेनाइल डायबिटीज की शिकार हैं. 2010 में पायल की बिजनेसमैन डिकी सिन्हा से शादी हुई थी. जयंत मुखर्जी, पायल और डिकी तीनों एक कंपनी में डायरेक्टर थे. लेकिन 2016 में उनके बीच विवाद हुआ और उनके आपसी रिश्तों में मतभेद पैदा हुए.

2017 से पायल लगातार अस्पताल के चक्कर लगा रही हैं. उनकी हालत दिनोंदिन खराब होती जा रही है. वे लंबे समय से बेहोशी की हालत में हैं. कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा गया है कि ''28 अप्रैल 2018 में पायल को अस्पताल से घर लाया गया. डिकी ने देखभाल के लिए नर्सें रखीं. डॉक्टर ने फिजियोथेरेपी और डाइट का खास ख्याल रखने को कहा था. लेकिन इसे फॉलो नहीं किया गया.''

''डिकी ने ना ही फिजियोथेरेपी कराई ना ही पायल की डाइट में बदलाव किया. स्टाफ की पेमेंट भी बंद कर दी है. नर्सें चली गई हैं. हमें पायल की मेडिकल रिपोर्ट दिखाने से दामाद ने मना कर दिया है. हमें बेटी की हेल्थ से जुड़ी किसी अपडेट की जानकारी नहीं है. डिकी हमें पायल से मिलने भी नहीं देता.''

मौसमी और जयंत अपनी बेटी को लेकर फिक्रमंद हैं. उनके वकील का कहना है कि डिकी बिल्कुल भी सहयोग नहीं कर रहे हैं. उन्होंने 20 नवंबर को खार पुलिस में भी शिकायत दर्ज कराई थी. जिसमें पायल की जिंदगी को बचाने के लिए तुंरत एक्शन लेने की अपील की गई थी.

क और प्रत्यक्षदर्शी अनीस बेग ने आरोप लगाया कि उनके उम्मीदवार की लोकप्रियता के चलते संजय सिंह जो कि मुख्यमंत्री के साले हैं और बीजेपी के उम्मीदवार दोनों की हालत ख़राब चल रही थी. बेग के मुताबिक दोनों प्रत्याशियों को हार से बचाने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंहने यह कदम उठाया.   

उधर आज तक से बात करते हुए निर्दलीय प्रत्याशी गौरव सिंह पारधी ने इस मामले में कुछ भी कहने से इंकार कर दिया. वो कैमरे के सामने आए लेकिन हकीकत कहने से बचते रहे. वारासिवनी विधानसभा सीट पर शिवराज सिंह चौहान के साले संजय सिंह कांग्रेस के टिकट पर चुनाव मैदान में हैजबकि कांग्रेस ने अपने जिस पूर्व विधायक का टिकट काट कर संजय सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया इस पूर्व विधायक ने पार्टी से बगावत कर दी.

इस पूर्व विधायक प्रदीप जसवाल के चुनावी मैदान में कूद जाने से बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों के समीकरण बिगड़ गए हैं जबकि एक निर्दलीय उम्मीदवार गौरव सिंह पारधी के भी चुनावी मैदान में होने के चलते बीजेपी और कांग्रेस दोनों पर वोट विभाजन का खतरा बढ़ गया.लिहाजा शिवराज सिंह चौहान ने निर्दलीय उम्मीद्वार को बीजेपी के पक्ष में बैठा दिया.

Wednesday, November 7, 2018

क्या है फैजाबाद से अयोध्या बने शहर के बनने-बिगड़ने की कहानी?

यूपी के सीएम योगी आदित्य नाथ ने छोटी दिवाली पर फैजाबाद का नाम अयोध्या करके इस शहर को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है. हिंदू संतों का तर्क हुआ करता था कि जहां राम का जन्म हुआ उस नगरी का नाम भी अगर हम नहीं बदल सके तो हमें धिक्कार है. संत समाज योगी से जो बड़ी अपेक्षा कर रहा था वह भले ही पूरी न हुई हो, लेकिन उनकी एक मांग तो पूरी हो ही गई है. फैजाबाद से कई बार सांसद रह चुके विनय कटियार भी फैजाबाद का नाम अयोध्या करने की मांग कई बार कर चुके थे. किसने रखा फैजाबाद का नाम, क्यों प्रसिद्ध हुआ यह शहर, कब था इसका स्वर्णकाल आइए जानते हैं.

अयोध्या किसी जमाने में कौसल राज्य की राजधानी थी. महाकाव्य रामायण के अनुसार राम का जन्म यहीं हुआ था. संतों का कहना है कि धर्म की पुरानी किताबों में भी इस शहर का नाम अयोध्या ही मिलता है और इस तथ्य को कोई नकार नहीं सकता. लेकिन फैजाबाद एक ऐसा शहर रहा है, जो बनता बिगड़ता रहा है, कभी इसने अपना चरमोत्कर्ष देखा है तो कभी उपेक्षाएं भी झेली हैं. 

सरयू का किनारा और लखनऊ से इसकी नजदीकी इसे हमेशा खास बनाती रही है. राम मंदिर आंदोलन ने फैजाबाद को पूरे विश्व में प्रसिद्ध कर दिया. इस शहर की नींव उस समय रखी गई थी जब नवाबों का शासन उभार पर था. इस शहर की स्थापना बंगाल के नवाब अलीवर्दी खान ने की, लेकिन फैजाबाद की नींव दूसरे नवाब सआदत खान ने रखी. उनके उत्तराधिकारी सुजाउद्दौला ने फैजाबाद को अवध की राजधानी बनाया.  छोटी सी बस्ती से बढ़ते- बढ़ते यह आज यह यूपी के बड़े शहरों में शामिल है. 

सैन्य मुख्यालय बना

नवाब सफदरजंग ने 1739-54 में इसे अपना सैन्य मुख्यालय बनाया. इसके बाद आए शुजाउद्दौला ने फैजाबाद में किले का निर्माण कराया. यह वह दौर था जब यह शहर अपनी बुलंदियों पर था. लखनऊ से इसकी दूरी सिर्फ 130 किमी थी, लेकिन इसे छोटा कोलकाता कहा जाता था क्योंकि नवाब उधर से होते हुए आए थे और अपनी तहजीब और रंग ढंग भी लेते आए थे.

शुजाउद्दौला का समय एक तरह से फैजाबाद के लिए स्वर्णकाल कहा जा सकता है. उस दौरान फैजाबाद ने जो समृद्धि हासिल की वैसी दोबारा नहीं कर सका. उस दौर में यहां कई इमारतों का निर्माण हुआ जिनकी निशानियां आज भी मौजूद हैं. शुजाउद्दौला की पत्नी बहू बेगम मोती महल में रहती थीं जहां से पूरे फैजाबाद का नजारा दिखाई देता था. 1775 में नवाब असफउद्दौला ने अपनी राजधानी फैजाबाद से बदलकर लखनऊ कर ली, इसके बाद यह अपनी रंगत खोने लगा.

राम मंदिर आंदोलन ने दिलाई विश्व में पहचान

राम मंदिर आंदोलन ने अयोध्या को विश्व के पटल पर ला दिया. एक समय ऐसा भी आय़ा अयोध्या के आगे फैजाबाद का नाम सीमित हो गया. दूसरे प्रदेश के लोगों को बताना पड़ता था कि अयोध्या फैजाबाद जिले में है. सरकार किसी की भी रही हो अयोध्या के विकास पर बहुत ज्यादा ध्यान किसी ने नहीं दिया. लोगों का कहना है कि भव्य राम मंदिर की बात तो हमेशा की जाती रही लेकिन अयोध्या की भव्यता पर कभी विचार नहीं किया गया.

北京发布新版餐饮服务单位经营服务指引 控制就餐人数

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